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विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में शामिल अंबेडकरवादी लेखकों की समीक्षा करेगा पीएमओ, गुमनाम पोस्ट में बताया गया था ‘जहर’

अभिषेक सिंह

एक गुमनाम सोशल मीडिया पोस्ट के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल अंबेडकरवादी विचारकों के लेखों पर कड़ा संज्ञान लिया है। शिक्षाविदों ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए इसे अकादमिक मामलों में अनावश्यक दखल बताया है।

देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जाने वाले अंबेडकरवादी विचारकों के लेखों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक गुमनाम पोस्ट, जिसमें इन लेखों को छात्रों के लिए कथित तौर पर ‘जहर’ करार दिया गया था, का संज्ञान लेते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। उच्च शिक्षा विभाग ने पीएमओ से मिले निर्देशों के बाद सत्ताईस सितंबर को सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को एक तत्काल पत्र भेजकर उनके पाठ्यक्रमों में शामिल इन विशिष्ट लेखों पर विस्तृत जवाब और टिप्पणियां मांगी हैं। यह अहम कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली विश्वविद्यालय, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध आशुतोष कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर इन लेखों को अकादमिक सामग्री के रूप में पढ़ाया जा रहा है।

सरकार के इस औचक कदम पर शिक्षाविदों और सामाजिक विचारकों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रसिद्ध शिक्षाविद कांचा इलैया शेफर्ड ने पाठ्यक्रमों में प्रधानमंत्री कार्यालय के इस सीधे हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम तय करना या उसकी समीक्षा करना पूरी तरह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और उच्च शिक्षा विभाग का अधिकार क्षेत्र है। जिन विचारकों और लेखकों की रचनाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनके बारे में विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि उन्हें पारंपरिक वामपंथी विचारधारा का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, इन अंबेडकरवादी लेखकों ने हमेशा जाति और लैंगिक न्याय के दृष्टिकोण से पारंपरिक भारतीय वामपंथी सोच की कड़ी आलोचना की है, क्योंकि अंबेडकरवाद शुरू से ही वामपंथियों के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत के खिलाफ रहा है। फिलहाल इस प्रशासनिक कदम ने अकादमिक स्वतंत्रता और शिक्षण संस्थानों में सरकारी हस्तक्षेप को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है, और अब सभी की निगाहें विश्वविद्यालयों द्वारा भेजे जाने वाले आधिकारिक जवाबों पर टिकी हैं।