Trending

स्नातकों की घटती ‘रोजगार-क्षमता’ बड़ी चुनौती-प्रो. संजय द्विवेदी

   पढ़ तो रहे हैं, पर आप सीखते क्या हैं? यह सवाल हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने यक्ष प्रश्न है। जैसे- भाषा का विद्यार्थी वर्षों तक पढ़ने के बाद भी ‘सही भाषा’ नहीं लिख पाता, तब आप उससे भाषा कौशल की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? ऐसे में कौशल विकास की नारेबाजियों के बीच हम वास्तव में कर क्या रहे हैं?
आंकड़े बताते हैं कि देश में उच्च शिक्षा के व्यापक विस्तार के साथ शोध करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। यानी उच्च शिक्षा में विस्तार के दिन हैं। स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले बढ़े हैं। हर वर्ग और समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरुकता बढ़ी है। किंतु स्नातकों की रोजगार-क्षमता अब भी बड़ी चुनौती है। डिग्री और जॉब मार्केट के बीच की इन खाइयों को पाटने पर गंभीरता जरूरी है।

डिग्रियां बांटने का कारखाना बने हैं शिक्षा परिसर-
हमारे नौजवान क्या और कैसे पढ़ रहे हैं कि वे रोजगार के मोर्चे पर आवश्यक योग्यताएं नहीं रखते? सरकारी, निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की पहुंच बढ़ी है। शिक्षा के लिए सरकार के इंतजाम हैं ही, शिक्षा में सक्रिय बाजार के खिलाड़ी भी उत्साहित हैं। देश में उच्च शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सकल नामांकन अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पर युवाओं और स्नातकों के बीच बेरोजगारी तथा कौशल-अंतराल गंभीर विमर्श का विषय बन गया है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण की रिपोर्ट और श्रम बाजार से संबंधित विभिन्न रिपोर्टें बताती हैं कि चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। तब सवाल उठता है कि क्या हमारी उच्च शिक्षा केवल ‘डिग्रियां बांटने का कारखाना’ है? या वह युवाओं को वास्तविक अर्थों में सक्षम भी बना रही है? डिग्रियां लेकर समाज में खड़े नौजवान आखिर क्या करेंगे? क्या वे केवल डिग्रीधारी बेरोजगार बनकर रह जाएंगे? बेरोजगारी को कम करने और युवाओं को रोजगार के योग्य बनाने का रास्ता क्या है? नई शिक्षा नीति कौशल विकास पर खासा जोर देती है, किंतु हमारे सामने अधोसंरचना का टोटा और अध्यापकों की कमी जैसी समस्याएं हैं, जिनके चलते कई अच्छे सपने दम तोड़ देते हैं।
देश की सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक विविधता को देखते हुए एक जैसी शिक्षा की बात अपने आप में बड़ी चुनौती है। निजी विश्वविद्यालयों में भारी फीस देने के बावजूद विद्यार्थियों को अपेक्षित गुणवत्ता और कौशल नहीं मिल पाता। कई जगह विद्यार्थियों के साथ क्लाइंट्स जैसा व्यवहार होने लगा है। कहीं-कहीं केवल डिग्रियां बांटने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। वहीं कुछ विद्यार्थी भी ऐसे हैं, जिन्हें केवल नाम के लिए डिग्री चाहिए। ऐसे विद्यार्थी शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने के बजाय उसे प्रभावित करते हैं।

परिसरों में हैं, पर कुछ सीखते नहीं-
देश में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात लगातार बढ़ा है। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी में वृद्धि सामाजिक समावेशन का महत्वपूर्ण संकेत है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों में भी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। विभिन्न श्रम एवं आजीविका अध्ययनों, जैसे ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ और ‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट’, में स्नातकों की रोजगार-क्षमता से जुड़ी गंभीर चुनौतियों की ओर संकेत किया गया है। उच्च डिग्रियां हासिल करने के बाद भी युवाओं का पारंपरिक या कम कौशल वाले अस्थायी कार्यों पर निर्भर होना चिंता की बात है। बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर भी नौजवानों को उनकी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल पाता। इसका कारण आवश्यक कौशल का अभाव भी है।
निजी क्षेत्र में रोजगार पाने के लिए केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। वहां सक्रिय व्यक्तित्व, संवाद-कौशल, तकनीकी दक्षता, विश्लेषण की क्षमता, समस्या-समाधान का हुनर और बदलती परिस्थितियों के साथ स्वयं को ढालने की क्षमता भी जरूरी है। अनेक नियोक्ताओं से चर्चा करने पर यह बात सामने आती है कि उन्हें डिग्रीधारी युवाओं की कमी नहीं, बल्कि काम के अनुरूप तैयार और प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी सैद्धांतिक और पारंपरिक शिक्षा पर अधिक जोर है, जबकि उद्योग जगत की मांग तकनीकी, व्यावहारिक और विश्लेषणात्मक दक्षता की है। भारी संख्या में संस्थानों के खुलने के बावजूद छात्र-शिक्षक अनुपात, शोध की गुणवत्ता और बुनियादी शोध निवेश के मामले में हम अनेक वैश्विक मानकों से पीछे हैं।
स्कूली शिक्षा के स्तर से ही, विशेषकर छठी कक्षा से, व्यावसायिक और कौशलपरक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। नई शिक्षा नीति भी इसी दिशा में ध्यान दिलाती है। लेकिन क्या हमारे परिसर इसके लिए तैयार हैं?
हमारे पाठ्यक्रम ऐसे होने चाहिए, जो बदलती दुनिया और बाजार की वास्तविक जरूरतों को समझ सकें। डिग्री पाठ्यक्रमों में ‘कमाई के साथ सीखने’ और अप्रेंटिसशिप मॉडल को बढ़ावा देना चाहिए। केवल परीक्षा पास करने और डिग्री हासिल करने की संस्कृति से आगे बढ़कर सीखने, काम करने और कौशल अर्जित करने की संस्कृति विकसित करनी होगी।

गुणात्मक सुधारों की जरुरत-
भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब हम मात्रात्मक विस्तार से आगे बढ़कर गुणात्मक उत्कृष्टता और रोजगार-उन्मुख सुधारों की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाएं। भारत जैसे विशाल देश में यह चुनौती और बड़ी है। एक ओर हमारे महानगरों और शहरों में शिक्षा के अनेक अवसर हैं, तो दूसरी ओर गांवों, आदिवासी और वनवासी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की स्थिति अभी भी चिंता का विषय है।
शासकीय विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बड़ी समस्या है। लोग ग्रामीण, आदिवासी और वनवासी क्षेत्रों में जाने के बजाय शहरों के आसपास ही नौकरियां करना पसंद करते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। निजी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के तेजी से विस्तार के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल बना हुआ है। आज सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर भी देश की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूरी तरह पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। देश में कई स्तरों की शिक्षा व्यवस्था विकसित हो गई है। समान शिक्षा और समान अवसर एक आदर्श और दूर का लक्ष्य बन गए हैं।

‘कौशल’ ही आपको मैदान में टिकाए रखेगा-
असल सवाल डिग्रियों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि उन डिग्रियों को अर्थपूर्ण बनाने का है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ऐसे युवा तैयार करने होंगे, जो केवल नौकरी खोजने वाले न हों, बल्कि अपने ज्ञान, कौशल और सृजनात्मकता के बल पर रोजगार पैदा करने की क्षमता भी रखते हों। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र देना नहीं है। व्यक्ति को जीवन और समाज की चुनौतियों से जूझने योग्य बनाना है।
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ‘डिग्री-केंद्रित’ होने के बजाय ‘ज्ञान, कौशल और व्यक्तित्व-केंद्रित’ बने। तभी डिग्रियों की बढ़ती संख्या देश के लिए वास्तविक मानव-संसाधन में बदल सकेगी। ‘डिग्रियां’ सिर्फ प्रवेश पत्र सरीखी हैं जबकि आपका ‘कौशल’ ही आपको मैदान में टिकाए रख सकता है। क्या वह हमारे पास है? सोचिएगा जरुर।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक हैं। संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)