जम्मू-कश्मीर के सरकारी खजाने पर 42 कंपनियों का बोझ, दिवालिया होने की कगार पर 14; कैग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

राघवेंद्र प्रताप सिंह
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के सरकारी उपक्रमों की बदहाल वित्तीय स्थिति की पोल खोल दी है। प्रदेश के 42 सार्वजनिक उपक्रमों में से 14 दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुके हैं, जबकि 20 कंपनियों ने मिलकर 252.53 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाया है।
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सरकारी स्वामित्व वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसई) की वित्तीय स्थिति को लेकर बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा 31 मार्च 2023 तक की स्थिति के आधार पर तैयार की गई ऑडिट रिपोर्ट में यह बड़ा खुलासा हुआ है कि प्रदेश के सरकारी खजाने पर कई उपक्रम सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उस अवधि के दौरान जम्मू-कश्मीर के कुल 42 सार्वजनिक उपक्रम कैग के ऑडिट दायरे में शामिल थे। इन कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन का बारीकी से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इनमें से अधिकांश इकाइयां वर्षों से कुप्रबंधन, वित्तीय संकट और कार्यकुशलता के अभाव के चलते भारी आर्थिक दबाव से जूझ रही हैं।
कैग की इस ऑडिट रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि 42 सरकारी उपक्रमों में से 14 उपक्रम अब दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इन कंपनियों की देनदारियां उनकी परिसंपत्तियों से कई गुना अधिक हो चुकी हैं, जिससे इनका सामान्य संचालन भी सरकारी मदद के बिना संभव नहीं रह गया है। इसके अतिरिक्त, 6 उपक्रम ऐसे पाए गए हैं जो पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुके हैं और लंबे समय से कोई भी व्यावसायिक या उत्पादक गतिविधि नहीं कर रहे हैं। इन निष्क्रिय उपक्रमों में भी कर्मचारियों के वेतन, प्रशासनिक खर्च और संपत्तियों के रख-रखाव के नाम पर सरकारी खजाने से लगातार धन खर्च हो रहा है, जो सीधे तौर पर जनता के करों की बर्बादी है।
वित्तीय आंकड़ों की समीक्षा से पता चलता है कि प्रदेश के 20 सार्वजनिक उपक्रमों ने कुल मिलाकर 252.53 करोड़ रुपये का भारी घाटा दर्ज किया है। इन घाटे में चल रही कंपनियों में विनिर्माण, पर्यटन, परिवहन और हस्तशिल्प जैसे प्रमुख क्षेत्रों से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं। एक ओर जहां अधिकांश कंपनियां लगातार घाटे में डूबती जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर लाभ कमाने वाले उपक्रमों का संतुलन भी पूरी तरह बिगड़ा हुआ है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के सभी लाभ कमाने वाले सरकारी उपक्रमों से प्राप्त कुल मुनाफे का 93 प्रतिशत हिस्सा अकेले जम्मू-कश्मीर बैंक से आया है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि बैंक को छोड़कर शेष लगभग सभी सरकारी उपक्रम राजस्व जुटाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं और लाभ का कोई दूसरा बड़ा स्रोत मौजूद नहीं है।
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी उपक्रमों की यह दयनीय स्थिति लंबे समय तक चलने वाले गैर-जिम्मेदाराना रवैये, समय पर ऑडिट न कराने और राजनीतिक हस्तक्षेप का नतीजा है। कई उपक्रमों ने दशकों से अपने वार्षिक खातों को अंतिम रूप नहीं दिया है, जिससे वित्तीय अनियमितताओं का सटीक आकलन करना भी कठिन हो जाता है। कैग की इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद अब प्रशासनिक सुधारों की मांग तेज हो गई है। जानकारों का कहना है कि सरकार को उन 14 उपक्रमों के पुनरुद्धार या विनिवेश पर तत्काल ठोस निर्णय लेना चाहिए जो दिवालिया होने की स्थिति में हैं, ताकि सरकारी खजाने पर बढ़ रहे कर्ज और घाटे के बोझ को रोका जा सके। साथ ही, जो 6 उपक्रम पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके हैं, उन्हें औपचारिक रूप से बंद करने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ताकि अनावश्यक प्रशासनिक खर्चों पर लगाम लगाई जा सके।