पीएम मोदी को मिले स्मृति चिह्नों की ई-नीलामी को मिला भारी जनसमर्थन: संस्कृति मंत्रालय ने 31 अक्टूबर तक बढ़ाई अंतिम तिथि

राघवेंद्र प्रताप सिंह
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को देश-विदेश के दौरों और विभिन्न आयोजनों के दौरान भेंट किए गए उपहारों और स्मृति चिह्नों की वार्षिक ऑनलाइन नीलामी को लेकर देशवासियों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। नागरिकों की व्यापक रुचि और नीलामी में भाग लेने की बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने ई-नीलामी (E-Auction) की अंतिम तिथि को आगे बढ़ाकर 31 अक्टूबर 2026 करने का निर्णय लिया है। यह इस वार्षिक ई-नीलामी का छठा संस्करण है, जिसके माध्यम से एकत्र होने वाली पूरी धनराशि को सीधे केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी ‘नमामि गंगे मिशन’ को समर्पित किया जाता है।
इस बार की ई-नीलामी में 600 से अधिक अनूठे और ऐतिहासिक उपहार शामिल किए गए हैं, जिनका न्यूनतम आरक्षित मूल्य मात्र 100 रुपये से लेकर कई लाख रुपये तक निर्धारित किया गया है। यह नीलामी प्रक्रिया आधिकारिक वेब पोर्टल (pmmementos.gov.in) के माध्यम से पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल तरीके से संचालित की जा रही है। कोई भी सामान्य नागरिक, संस्था या कला प्रेमी पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराकर अपनी पसंद के स्मृति चिह्न के लिए बोली लगा सकता है।
नीलामी के प्रमुख आकर्षणों में पेरिस ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों में ऐतिहासिक प्रदर्शन करने वाले भारतीय एथलीटों द्वारा प्रधानमंत्री को भेंट किए गए खेल उपकरण, जैसे बैडमिंटन रैकेट, जूतों के जोड़े, ऑटोग्राफ युक्त जर्सी और तीरंदाजी के उपकरण शामिल हैं। इसके अलावा, देश भर की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करने वाली पारंपरिक कलाकृतियां भी इस नीलामी का मुख्य केंद्र बनी हुई हैं। इनमें अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम की सूक्ष्म काष्ठ और पीतल की प्रतिकृतियां, गुजरात की पारंपरिक रोगन पेंटिंग, तंजौर की कलाकृतियां, हस्तनिर्मित पश्मीना शॉल और पूर्वोत्तर के जनजातीय समुदायों द्वारा भेंट की गई दुर्लभ पारंपरिक धरोहरें शामिल हैं।
संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस नीलामी की सफलता केवल एकत्रित की गई धनराशि में नहीं, बल्कि इसमें जनभागीदारी के गहरे जुड़ाव में निहित है। देशवासी गर्व के साथ इन स्मृति चिह्नों को अपने घरों और कार्यालयों में संजोने के लिए बोली लगा रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनके द्वारा खर्च किया गया एक-एक पैसा पवित्र मां गंगा के संरक्षण, कायाकल्प और जलीय जीवन को बचाने के पुनीत कार्य में इस्तेमाल होगा। तिथि के विस्तार से अब सुदूर ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के लोगों को भी इस सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मिशन का हिस्सा बनने का अतिरिक्त समय मिल गया है।