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अनिश्चित वैश्विक माहौल में मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था का रोडमैप: 5वां कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव शुरू, नीति निर्धारकों का महामंथन

अभिषेक सिंह

नई दिल्ली: वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों, आपूर्ति श्रृंखलाओं में विखंडन और आर्थिक अस्थिरता के बीच भारत की विकास यात्रा को दिशा देने के लिए राजधानी नई दिल्ली में प्रतिष्ठित ‘5वां कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन’ (Kautilya Economic Conclave) औपचारिक रूप से शुरू हो गया है। 3 से 5 अक्टूबर तक चलने वाले इस त्रिदिवसीय सम्मेलन का आयोजन आर्थिक विकास संस्थान (IEG) द्वारा केंद्रीय वित्त मंत्रालय के सहयोग से किया जा रहा है। इस वर्ष के कॉन्क्लेव का मुख्य केंद्रीय विषय “रेज़िलिएंस इन एन एज ऑफ़ फ्लक्स” (Resilience in an Age of Flux – अनिश्चितता के दौर में लचीलापन और मजबूती) रखा गया है।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन, दुनिया भर के प्रमुख केंद्रीय बैंकों के प्रतिनिधि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों सहित भारतीय उद्योग जगत के दिग्गज शामिल हुए। उद्घाटन भाषण में वित्त मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि जब प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं उच्च मुद्रास्फीति, अत्यधिक ऋण और मंदी के दबाव से जूझ रही हैं, तब भारत अपनी वित्तीय अनुशासनबद्धता, सुदृढ़ बैंकिंग प्रणाली और रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय (Capex) के बल पर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।

सम्मेलन में मुख्य रूप से चार प्रमुख स्तंभों पर गहन चर्चाएं हो रही हैं: पहला, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन और ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत को विनिर्माण का वैश्विक हब बनाना; दूसरा, वित्तीय स्थिरता को प्रभावित किए बिना हरित ऊर्जा संक्रमण (Green Energy Transition) के लिए आवश्यक खरबों डॉलर का वित्तपोषण जुटाना; तीसरा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के जरिए उत्पादकता में क्रांतिकारी सुधार; और चौथा, भू-राजनीतिक तनावों से खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का प्रबंधन।

नीति आयोग और वित्त मंत्रालय के विशेषज्ञों ने कॉन्क्लेव में ‘विकसित भारत @2047’ के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संरचनात्मक सुधारों की रूपरेखा प्रस्तुत की। विशेषज्ञों का एकमत मानना है कि भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश (युवा आबादी), बढ़ता घरेलू उपभोग और यूपीआई जैसी डिजिटल नवाचार प्रणालियां देश को बाहरी आर्थिक झटकों से सुरक्षित रखने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं। तीन दिनों तक चलने वाले इस विचार मंथन से निकलने वाले नीतिगत निष्कर्ष आगामी केंद्रीय बजट और भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक नीतियों को तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।