राष्ट्रपिता बापू और शास्त्री जी की जयंती पर ‘स्वदेशी और स्वच्छता’ का महासंकल्प: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में जनआंदोलन का आह्वान

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती के पावन अवसर पर समूचे देश ने इन दोनों महान विभूतियों के आदर्शों को नमन करते हुए ‘स्वदेशी और स्वच्छता’ को अपने दैनिक जीवन का मूलमंत्र बनाने का राष्ट्रीय संकल्प लिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सहित देश के शीर्ष नेतृत्व ने क्रमशः राजघाट और विजय घाट जाकर बापू और शास्त्री जी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनके बताए मार्ग पर चलने की राष्ट्रव्यापी अपील की।
गांधी जयंती के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि बापू का ‘स्वदेशी’ का विचार 21वीं सदी में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के रूप में जीवंत हो चुका है। प्रधानमंत्री ने प्रत्येक नागरिक, विशेषकर युवाओं और उद्यमियों से आग्रह किया कि वे त्योहारों के इस मौसम में स्थानीय कारीगरों, बुनकरों, मिट्टी के बर्तन बनाने वालों और छोटे दुकानदारों द्वारा बनाए गए स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब हम किसी स्थानीय उत्पादक से खरीदारी करते हैं, तो उससे केवल एक उत्पाद की बिक्री नहीं होती, बल्कि भारत के किसी गरीब परिवार के घर में खुशहाली और स्वावलंबन का दीया जलता है।
इसी दिन देश भर में पखवाड़े भर से चल रहे ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान का भव्य समापन भी हुआ। पिछले दस वर्षों में ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत भारत द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए सरकार ने बताया कि स्वच्छता अब केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के स्वभाव का हिस्सा बन चुकी है। इस अवसर पर लाखों नागरिकों, पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और स्कूली बच्चों ने सार्वजनिक पार्कों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और जलस्रोतों की सफाई के लिए सामूहिक ‘श्रमदान’ किया।
वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके अमर नारे “जय जवान, जय किसान” के मर्म को याद किया गया। नेताओं ने रेखांकित किया कि कैसे शास्त्री जी ने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में देश को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनने और सीमाओं की रक्षा करने का अटूट साहस दिया था। उनका सादगीपूर्ण जीवन, नैतिक मूल्य और राष्ट्रीय स्वाभिमान आज भी शासन व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन के लिए सर्वोत्तम मार्गदर्शक हैं। गांधी और शास्त्री जयंती के इस संयुक्त राष्ट्रीय पर्व ने देश को एक बार फिर यह संदेश दिया कि नैतिक चरित्र, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और स्वच्छ परिवेश ही एक सशक्त और विकसित भारत की आधारशिला हैं।