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प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से जीवन को दिशा: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषितम्, परोपकार और उच्च नैतिक चरित्र का दिया संदेश

विवेक ओझा

नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति के अमर मूल्यों, नैतिक दर्शन और भाषा की समृद्धि को जन-जन तक पहुंचाने की अपनी निरंतर पहल के तहत प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों के साथ एक अत्यंत विचारोत्तेजक और प्रेरणादायक संस्कृत ‘सुभाषितम्’ साझा किया है। प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए इस श्लोक में एक श्रेष्ठ, उदात्त और परोपकारी व्यक्ति के मूल लक्षणों का सूक्ष्म और काव्यात्मक वर्णन किया गया है। प्रधानमंत्री का यह संदेश आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव और भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा के बीच आत्म-अवलोकन और चारित्रिक उत्थान का एक गहरा आह्वान बनकर उभरा है।

संस्कृत भाषा का साहित्य केवल पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक जीवन प्रबंधन, कूटनीति, अर्थशास्त्र और मानवीय मनोविज्ञान का एक अतुलनीय भंडार है। संस्कृत के ‘सुभाषित’ (सु + भाषित = सुंदर और हितकारी वचन) ऐसे सूक्ति-वाक्य हैं जो गागर में सागर की तरह जीवन के गूढ़ सत्यों को सरल दो पंक्तियों में समेट लेते हैं। प्रधानमंत्री द्वारा उद्धृत श्लोक में रेखांकित किया गया है कि एक सच्चे और महान व्यक्ति की पहचान उसके धन, पद या बाह्य चमक-दमक से नहीं, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में उसके अडिग धैर्य, विनम्रता और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति उसकी करुणा से होती है।

श्लोक का भावार्थ यह स्पष्ट करता है कि जिस प्रकार फल से लदे वृक्ष झुक जाते हैं, पानी से भरे बादल पृथ्वी को तृप्त करने के लिए नीचे आ जाते हैं, उसी प्रकार वास्तविक ज्ञानी और सामर्थ्यवान व्यक्ति स्वभाव से अत्यंत विनम्र और परोपकारी होते हैं। वे अपने व्यक्तिगत लाभ की चिंता किए बिना दूसरों के दुखों को हरने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे नैतिक विचार केवल पुस्तकों में बंद रहने के लिए नहीं हैं, बल्कि इन्हें शासन व्यवस्था, सार्वजनिक जीवन और नागरिक कर्तव्यों का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।

डिजिटल युग में युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने के लिए प्रधानमंत्री की यह पहल अत्यंत प्रभावशाली मानी जा रही है। सोशल मीडिया पर इस सुभाषितम् के साझा होते ही लाखों नागरिकों ने इसे अपनी दिनचर्या और कार्यसंस्कृति में आत्मसात करने का संकल्प व्यक्त किया। जानकारों का कहना है कि जब देश ‘विकसित भारत @2047’ के बड़े आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों की ओर अग्रसर है, तब प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के ये नैतिक मूल्य ही हमें एक संवेदनशील, संतुलित और मानवीय समाज बनाए रखने का संबल प्रदान करेंगे।