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प्रतिभा पलायन (Brain Drain) से ‘ब्रेन गेन’ तक की छलांग: निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खुलने से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान में आई क्रांति, डॉ. जितेंद्र सिंह का विशेष संवाद

विवेक ओझा | द इंडियन व्यू

वाराणसी/नई दिल्ली: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल श्रीहरिकोटा से रॉकेट लॉन्च करने या उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने तक सीमित नहीं रह गया है; यह अब आम आदमी के दैनिक जीवन, खेती-किसानी और देश के बुनियादी ढांचे का एक अभिन्न अंग बन चुका है। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के छात्रों, शोधकर्ताओं और अंतरिक्ष विशेषज्ञों के साथ आयोजित एक विशेष ‘जन संवाद’ में यह महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र (Space Sector) को निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खोलने के ऐतिहासिक फैसले ने देश के ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) को रोक दिया है।

वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा किए गए साहसिक अंतरिक्ष सुधारों और ‘इन-स्पेस’ (IN-SPACe) के गठन का जिक्र करते हुए डॉ. सिंह ने बताया कि पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपनी पूरी क्षमता के बावजूद सरकारी लालफीताशाही और सीमित बजट के कारण एक दायरे में बंधा हुआ था। लेकिन सुधारों के बाद, मात्र कुछ ही वर्षों में भारत में अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या सिंगल डिजिट से बढ़कर सैकड़ों में पहुंच गई है। अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) और स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) जैसी भारतीय निजी कंपनियों ने अपने स्वयं के रॉकेट और सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च करके पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इस उदारीकरण ने उन हजारों युवा भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को भारत में ही अपने सपने पूरे करने का अवसर दिया है, जो पहले नासा (NASA) या यूरोपीय स्पेस एजेंसियों की ओर रुख करने को मजबूर थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने छात्रों को संबोधित करते हुए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के रोजमर्रा के उपयोग (Everyday Applications) पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार आज उपग्रह डेटा का उपयोग स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के नियोजन, रेलवे फाटकों की निगरानी, हाईवे निर्माण की गुणवत्ता जांच और यहां तक कि मनरेगा (MGNREGA) परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग के लिए किया जा रहा है। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में, इसरो की प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) के कारण चक्रवातों और बाढ़ से होने वाली जनहानि लगभग शून्य हो गई है।

कृषि क्षेत्र में भी, उपग्रहों के माध्यम से मौसम की सटीक भविष्यवाणी, मिट्टी की नमी का आकलन और फसल बीमा दावों के निपटारे के लिए ‘क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट’ किए जा रहे हैं। ‘नाविक’ (NavIC) जो कि भारत की अपनी स्वदेशी जीपीएस प्रणाली है, आज मछुआरों को गहरे समुद्र में सुरक्षित रहने और संभावित मत्स्य क्षेत्रों (PFZ) की पहचान करने में मदद कर रही है। टेलीमेडिसिन (Telemedicine) और टेली-एजुकेशन के जरिए सुदूर ग्रामीण इलाकों तक विशेषज्ञ स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं पहुंच रही हैं। डॉ. सिंह ने आश्वस्त किया कि भारत का अंतरिक्ष उद्योग 2040 तक वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने नाम करेगा, और इसमें देश के युवा नवोन्मेषकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।