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कपड़ा उद्योग के विकास को नई रफ्तार: वस्त्र उद्योग विकास परिषद (DCTI) की पहली बैठक संपन्न, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आत्मनिर्भरता पर जोर

विवेक ओझा | द इंडियन व्यू

नई दिल्ली: भारतीय परिधान और कपड़ा मूल्य श्रृंखला (Textile Value Chain) को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी, आधुनिक और एकीकृत बनाने के उद्देश्य से नवगठित ‘वस्त्र उद्योग विकास परिषद’ (Development Council for Textile Industry – DCTI) की पहली और अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुई। केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित इस उच्च-स्तरीय बैठक में सरकार के शीर्ष अधिकारियों, उद्योग जगत के दिग्गजों, परिधान निर्यातकों और कपास उत्पादक किसान संघों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस परिषद का गठन भारत के कपड़ा उद्योग को नई दिशा देने और 2030 तक 100 अरब डॉलर के कपड़ा निर्यात लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक रणनीतिक मंच के रूप में किया गया है।

बैठक के दौरान मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्तंभों पर गहन चर्चा की गई: कपास किसानों का सशक्तिकरण, उत्पादन प्रक्रिया में पारदर्शिता, और संपूर्ण कपड़ा उद्योग के लिए भविष्य का तकनीकी रोडमैप तैयार करना। वस्त्र मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि भारत की कपड़ा आपूर्ति श्रृंखला की सबसे बड़ी ताकत इसके कपास किसान हैं। ‘कस्तूरी कॉटन भारत’ (Kasturi Cotton Bharat) जैसी पहलों के माध्यम से भारतीय कपास की वैश्विक ब्रांडिंग और उसकी गुणवत्ता (Traceability) सुनिश्चित करने पर विशेष रणनीति तैयार की गई। किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक सिंचाई तकनीक और उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए उद्योग जगत को सीधे किसानों के साथ जोड़ने (Contract Farming) के मॉडल पर भी सहमति बनी।

भारतीय कपड़ा उद्योग इस समय वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है, जिन्हें प्रमुख पश्चिमी बाजारों में तरजीही शुल्क (Duty-Free Access) का लाभ मिलता है। इस चुनौती से निपटने के लिए DCTI की बैठक में तकनीकी वस्त्रों (Technical Textiles) और मानव निर्मित फाइबर (Man-Made Fibre – MMF) के उत्पादन को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। पीएलआई (PLI) योजना और ‘पीएम मित्र’ (PM MITRA) मेगा टेक्सटाइल पार्कों की प्रगति की समीक्षा करते हुए उद्योगपतियों से अपील की गई कि वे इन पार्कों में विश्वस्तरीय ‘प्लग एंड प्ले’ बुनियादी ढांचे का लाभ उठाकर बड़े पैमाने पर निवेश करें, जिससे उत्पादन लागत में कमी आए और ‘इकॉनमी ऑफ स्केल’ (Economy of Scale) हासिल की जा सके।

इसके अतिरिक्त, यूरोपीय संघ के कड़े पर्यावरण नियमों (ESG Norms) और ‘सर्कुलर इकॉनमी’ (Circular Economy) की बढ़ती मांग को देखते हुए, परिषद ने भारतीय कपड़ा मिलों में शून्य-कार्बन उत्सर्जन (Zero Carbon Emission) और जल पुनर्चक्रण (Water Recycling) तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया। बैठक के अंत में एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र के बीच विश्वास और समन्वय बढ़ाने तथा वैश्विक मंचों पर ‘मेक इन इंडिया’ परिधानों की साख मजबूत करने का संकल्प लिया गया। यह पहली बैठक स्पष्ट रूप से भारतीय कपड़ा उद्योग को उसके स्वर्णिम युग में वापस ले जाने का एक ठोस ब्लूप्रिंट प्रस्तुत करती है।