नजूल सम्पत्ति अध्यादेश को लेकर अभी तक नहीं हुआ पैनल का गठन, जानिए कहां फंसा है पेंच

बीएस राय : उत्तर प्रदेश में 22 नवंबर को राज्य मंत्रिमंडल द्वारा उत्तर प्रदेश नजूल संपत्ति (सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए प्रबंधन और उपयोग) अध्यादेश, 2024 को संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना की अध्यक्षता वाली समिति को भेजे जाने के लगभग 10 दिन बाद, इस मुद्दे पर पैनल का गठन होना बाकी है। हालांकि इस मामले को लेकर सरकार के आला मंत्री और अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, समिति के गठन में देरी हो गई है। समिति के बारे में पूछे जाने पर खन्ना ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। समिति को अध्यादेश के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने का निर्देश दिया गया था, जिसका उद्देश्य माफियाओं, बिल्डरों और राजनेताओं के गठजोड़ को तोड़ना है, और अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपना है। सूत्रों के अनुसार, समिति के गठन में देरी हो गई है। समिति के बारे में पूछे जाने पर खन्ना ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
अब, सभी की निगाहें दिसंबर के मध्य में होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र पर होंगी। मानसून सत्र के दौरान, विधानसभा ने कुछ भाजपा और उसके गठबंधन के विधायकों के साथ-साथ सपा और कांग्रेस के विधायकों के विरोध के बीच नजूल संपत्ति (सार्वजनिक प्रयोजन के लिए प्रबंधन और उपयोग) विधेयक, 2024 पारित किया। लेकिन विधान परिषद ने विधेयक को एक प्रवर समिति को भेज दिया।
यह देखना बाकी है कि राज्य सरकार शीतकालीन सत्र के दौरान दोनों सदनों में विधेयक पारित करवा पाती है या नहीं। इससे पहले, 7 मार्च को राज्यपाल ने नजूल अध्यादेश जारी किया था, क्योंकि राज्य विधानमंडल सत्र में नहीं था। वह अध्यादेश समाप्त हो चुका है।
राज्य सरकार के एक अधिकारी ने कहा, “राज्य सरकार यह संदेश देना चाहती थी कि नजूल भूमि बिल्डरों और भूमि हड़पने वालों के शोषण के लिए फ्रीहोल्ड नहीं होगी, बल्कि इसका उपयोग जनहित में किया जाएगा – शहरों में सुविधाओं के विकास के लिए।” भाजपा विधायकों के साथ-साथ सहयोगी अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के विरोध ने राज्य सरकार की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
एक मंत्री ने कहा, “मुकदमेबाजी के डर से राज्य सरकार हर कदम सावधानी से उठाना चाहती है। विधेयक के पक्ष और विपक्ष के साथ-साथ राजनीतिक नतीजों का अध्ययन करने के बाद ही वह विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी के लिए फिर से लाएगी या सदन में पारित कराएगी।” प्रदेश में करीब 72,000 से 75,000 एकड़ नजूल भूमि है। नजूल अधिनियम में फ्रीहोल्ड का प्रावधान नहीं है, फिर भी कम से कम 25 फीसदी नजूल भूमि को फ्रीहोल्ड में परिवर्तित किया जा चुका है।
करीब 2 लाख करोड़ रुपये की कीमत वाली इन सरकारी जमीनों को सर्किल रेट के महज 10 फीसदी दाम पर हासिल करने का सिलसिला जारी है। नजूल भूमि मुख्य रूप से प्रयागराज, कानपुर, अयोध्या, सुल्तानपुर, गोंडा और बाराबंकी जिलों में स्थित है। प्रयागराज को नजूल भूमि को फ्रीहोल्ड के तौर पर हासिल करने का प्राथमिक केंद्र माना जाता है।
राज्य सरकार ने सभी जिलों के जिलाधिकारियों को संबंधित जिलों में नजूल भूमि पर रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया था। सूत्रों के मुताबिक कई डीएम ने अपनी रिपोर्ट नहीं भेजी है। 1993 में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एनएन वोहरा समिति ने राजनेताओं, अपराधियों, भू-माफियाओं और नौकरशाहों से जुड़े संगठित भूमि हड़पने वाले गिरोहों की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई थी, जो सरकारी नीतियों की खामियों का फायदा उठाकर सरकारी जमीनों पर कब्जा करने में सक्रिय थे। मंत्री ने कहा कि वोहरा समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही उत्तर प्रदेश सरकार ने नजूल भूमि के प्रबंधन और उपयोग के लिए विधेयक लाने का फैसला किया।